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14 July 2017

गधे चाहिए

उन्हें इंसान नहीं
कुछ गधे चाहिए
जो उनकी ही देखें -सुनें
अकल के अंधे चाहिए ।

कोशिश  तो की कई बार
कि हट जाए आँखों से पट्टी
उन्हें सिर्फ एक दिखता है
बाकियों मे खोट चाहिए ।

ये ज़माना और है
वो ज़माना और था
अब तो हर काम में
कोल्हू के बैल चाहिए ।

यश ©

01 July 2017

छोटू .....

रामू की
चाय की दुकान पर
कोल्हू का बैल बना
छोटू
इस गर्मी में
अंगीठी की आंच
खौलते दूध की भाप
और ग्राहकों की मांग
झेलता हुआ भी
बना रहता है
तरो -ताज़ा।

उसकी मुस्कुराहट
और
मक्खन की
टिक्की की तरह
मुलायम
उसकी बातें
बना देती हैं
रामू की दुकान को
और भी मशहूर
क्योंकि
छोटू के हाथ की चाय
समोसे
और बन-मक्खन
दूर  कर चुके हैं
उससे उसका बचपन।

-यश©

10 June 2017

सब अच्छा है.....

नहीं कहीं कमी कोई
जो दिख रहा वह अच्छा है
जो कुछ अब तक सुना-सुनाया
सबने कहा वह सच्चा है।

बांध आँख पर काली पट्टी
डूब कर दिन के सपनों में
अच्छा-अच्छा अपने कहते
जो मन कहता वह सच्चा है।

लंबी चादर तान कर सोता
दिन-रात का पता नहीं कुछ
मुझ से आ कर यह मत पूछो
बाहर शोर क्यूँ शोर होता है ।

नहीं कहीं कमी कोई
जो दिख रहा वह अच्छा है
बुरा बराबर जो जो कहता
वह सब अकल का कच्चा है।

-यश ©
10/जून/2017

01 June 2017

वहीं उसी मोड़ पर ......

बीत रहा है
साल दर साल
और मैं वहीं
उसी मोड़ पर
हूँ खड़ा
जहाँ
मेरी तक़दीर
या
कारनामे
छोड़ गए थे
बीती
कई सदियों पहले।
 .
मैं
तब से आज तक
धूप -छाँह
आँधी -तूफान
और
न जाने क्या क्या
झेलता हुआ
सहता हुआ
खुद से
खुद की
कहता हुआ
बस कर रहा हूँ -
तलाश
तो सिर्फ
उस पल की
जिस पल
कोई मुक्तिदूत
आ कर
दिखा दे राह
इस मूर्त जन्म से
किसी नये
पारदर्शी जन्म की।

-यश ©


25 May 2017

टाई वाला मजदूर......


एक्ज़िक्यूटिव क्लास
टाई वाला मजदूर
अपने गले में
आई कार्ड का पट्टा लटकाए
कान में हेडफोन
और 'कॉन कॉल' का
शोर सुनते हुए
'लाइन' पर रह कर
'एक्सक्यूजेज़' देते हुए
भटकता फिरता है
दर बदर
भारी भरकम
और कभी कभी
एवरेस्ट से भी ऊंचे
टारगेट के
चरम
या उसके आस-पास
कहीं पहुँचने को।

वह दिन भर
मौसम के हर रूप
शहर के हर मोड़
और गली को
गूगल के नक्शे पर
नापते हुए
अपनी कुंठा
और खिन्नता को
छुपाते हुए
अपने चेहरे की
कृत्रिम मुस्कुराहट
और ऊर्जा से
कोशिश करता है
ए सी की ठंडक में
लक्ज़री चेयर पर बैठे
अपने 'क्लाइंट' को
लुभाने की
और बदले में
कुछ पाने की।

एक्ज़िक्यूटिव क्लास
टाई वाला मजदूर
'बेलदार' तो नहीं
पर उससे
कम भी नहीं होता
यह बात अलग है
कि वह ईंट और गारा
नहीं ढोता।
वह ढोता है
अपने दिमाग में
बहुमुखी अपेक्षाओं
आशंकाओं की
ईंटों के चट्टे ...
अपने
अनोखे 'लक्ष्यों'
और उन्हें पाने की
जुगाड़ों के
कई नायाब तरीके।

वह
करता रहता है
हर संभव कोशिशें
नौकरी को
'सेफ' रखने की
'इन्सेंटिव' नहीं
तो 'सिर्फ 'सैलरी' से
जीने की
क्योंकि उसके घर में
उसके साथ
कुछ लोग
गुज़र करते हैं
एक छोटी सी रसोई में
बने
दाल-भात
सब्जी और अचार की
थोड़ी सी
खुराक से।

-यश©
25/मई/2017


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