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16 July 2017

कुछ लोग -39

बने रहो पगला
काम करेगा अगला की
तर्ज़ पर
'बैल बुद्दि' वाले
कुछ लोग
अपने प्रतिउत्तरों से
निरुत्तर करने की बजाय
खेल जाते हैं
उल्टे दांव।
ऐसे कुछ लोग
न जाने
किस सोच मे डूबे हुए
सिर्फ खुद को सही
और ज्ञाता मानते हुए
अपने पूर्वानुमानों को ही
सबसे सही बताते हुए
बस किसी तरह ही
रख पाते हैं काबू
अपने भीतर के शैतान को।
'बैल बुद्दि' वाले
कुछ लोग
मजबूर होते हैं
अपनी आदतों
और आनुवंशिकी
संस्कारों से
जिनको बदल पाना \
हो नहीं सकता
कभी भी
किसी भी तरह
संभव।
.
-यश©

14 July 2017

बी ए पास रिक्शे वाला


बी ए पास
वह रिक्शे वाला
मौसम की हर मार से
बे असर –बे खबर
हर समय रहता है तैयार
चलने को
तलवार की धार की तरह
पैनी तीखी
मेरे शहर की
सड़कों के साथ जाती
किसी की मंज़िल तक
पहुँचने को
या
पहुंचाने को।

वह
सवारियों के लिए
उठा लेता है
‘हुड’
धूप और
बरसात से बचने को
लेकिन खुद
पसीने से तर-बतर
चेहरे पर मुस्कान
और ज़ुबान पर
मीठी बात लिए
किसी कुशल
‘सेल्समैन’ की तरह
गड्ढेदार सड़कों के
प्रतिउत्तर का
अपने संयम और
उत्साह से 
सामना करते हुए
बस कामना करता है
अपने ‘उचित प्रतिफल’ की।

बी ए पास
वह रिक्शे वाला
कल मुझे मिला
और इच्छा करने लगा
कहीं  
एक अदद नौकरी की
सिफ़ारिश की....
मदद की
बिना उसका उत्तर दिये
बी ए पास ‘मैं’
बस अपने मौन में
यही सोचता रहा
कि मुझसे कहीं बेहतर
आत्मनिर्भर
बी ए पास
वह रिक्शे वाला
आखिर क्यों
बनना चाहता है
मेरी तरह
सूट-बूट
टाई और काले चश्मे वाला
एक (अ)सभ्य मजदूर। 

-यश©
14/07/2017

गधे चाहिए

उन्हें इंसान नहीं
कुछ गधे चाहिए
जो उनकी ही देखें -सुनें
अकल के अंधे चाहिए ।

कोशिश  तो की कई बार
कि हट जाए आँखों से पट्टी
उन्हें सिर्फ एक दिखता है
बाकियों मे खोट चाहिए ।

ये ज़माना और है
वो ज़माना और था
अब तो हर काम में
कोल्हू के बैल चाहिए ।

यश ©

01 July 2017

छोटू .....

रामू की
चाय की दुकान पर
कोल्हू का बैल बना
छोटू
इस गर्मी में
अंगीठी की आंच
खौलते दूध की भाप
और ग्राहकों की मांग
झेलता हुआ भी
बना रहता है
तरो -ताज़ा।

उसकी मुस्कुराहट
और
मक्खन की
टिक्की की तरह
मुलायम
उसकी बातें
बना देती हैं
रामू की दुकान को
और भी मशहूर
क्योंकि
छोटू के हाथ की चाय
समोसे
और बन-मक्खन
दूर  कर चुके हैं
उससे उसका बचपन।

-यश©

10 June 2017

सब अच्छा है.....

नहीं कहीं कमी कोई
जो दिख रहा वह अच्छा है
जो कुछ अब तक सुना-सुनाया
सबने कहा वह सच्चा है।

बांध आँख पर काली पट्टी
डूब कर दिन के सपनों में
अच्छा-अच्छा अपने कहते
जो मन कहता वह सच्चा है।

लंबी चादर तान कर सोता
दिन-रात का पता नहीं कुछ
मुझ से आ कर यह मत पूछो
बाहर शोर क्यूँ शोर होता है ।

नहीं कहीं कमी कोई
जो दिख रहा वह अच्छा है
बुरा बराबर जो जो कहता
वह सब अकल का कच्चा है।

-यश ©
10/जून/2017

01 June 2017

वहीं उसी मोड़ पर ......

बीत रहा है
साल दर साल
और मैं वहीं
उसी मोड़ पर
हूँ खड़ा
जहाँ
मेरी तक़दीर
या
कारनामे
छोड़ गए थे
बीती
कई सदियों पहले।
 .
मैं
तब से आज तक
धूप -छाँह
आँधी -तूफान
और
न जाने क्या क्या
झेलता हुआ
सहता हुआ
खुद से
खुद की
कहता हुआ
बस कर रहा हूँ -
तलाश
तो सिर्फ
उस पल की
जिस पल
कोई मुक्तिदूत
आ कर
दिखा दे राह
इस मूर्त जन्म से
किसी नये
पारदर्शी जन्म की।

-यश ©


25 May 2017

टाई वाला मजदूर......


एक्ज़िक्यूटिव क्लास
टाई वाला मजदूर
अपने गले में
आई कार्ड का पट्टा लटकाए
कान में हेडफोन
और 'कॉन कॉल' का
शोर सुनते हुए
'लाइन' पर रह कर
'एक्सक्यूजेज़' देते हुए
भटकता फिरता है
दर बदर
भारी भरकम
और कभी कभी
एवरेस्ट से भी ऊंचे
टारगेट के
चरम
या उसके आस-पास
कहीं पहुँचने को।

वह दिन भर
मौसम के हर रूप
शहर के हर मोड़
और गली को
गूगल के नक्शे पर
नापते हुए
अपनी कुंठा
और खिन्नता को
छुपाते हुए
अपने चेहरे की
कृत्रिम मुस्कुराहट
और ऊर्जा से
कोशिश करता है
ए सी की ठंडक में
लक्ज़री चेयर पर बैठे
अपने 'क्लाइंट' को
लुभाने की
और बदले में
कुछ पाने की।

एक्ज़िक्यूटिव क्लास
टाई वाला मजदूर
'बेलदार' तो नहीं
पर उससे
कम भी नहीं होता
यह बात अलग है
कि वह ईंट और गारा
नहीं ढोता।
वह ढोता है
अपने दिमाग में
बहुमुखी अपेक्षाओं
आशंकाओं की
ईंटों के चट्टे ...
अपने
अनोखे 'लक्ष्यों'
और उन्हें पाने की
जुगाड़ों के
कई नायाब तरीके।

वह
करता रहता है
हर संभव कोशिशें
नौकरी को
'सेफ' रखने की
'इन्सेंटिव' नहीं
तो 'सिर्फ 'सैलरी' से
जीने की
क्योंकि उसके घर में
उसके साथ
कुछ लोग
गुज़र करते हैं
एक छोटी सी रसोई में
बने
दाल-भात
सब्जी और अचार की
थोड़ी सी
खुराक से।

-यश©
25/मई/2017


20 May 2017

यह तो होना ही था


जीवन के सफर में
कुछ पाना कुछ खोना ही था
हमें पहले ही पता था
कि यह तो होना ही था। 

उनकी फितरत ही ऐसी है
कि क्या कहें -कब कहें
खुद ही नहीं जानते
आँखों पर पट्टी बांधे हुए
वह सच को नहीं मानते। 

मझधार पर बीच भंवर में
फँसकर डूबना ही था
हमें पहले ही पता था
कि यह तो होना ही था।

-यश ©
20/मई/2017  

19 May 2017

कुंठित मन के सवाल....

मेरा कुंठित मन
पूछता है
कुछ सवाल
कभी कभी
कि वह क्या है
जो मेरे पास नहीं है
पर जो दूसरों के पास है .....
वह क्या है
जिसके न होते हुए
मैं जलता हूँ
कुढ़ता हूँ
मन ही मन
रखता हूँ चाह
उसे पाने की
जिसे पाना
आसान नहीं
या मुमकिन नहीं ...
पर
जब सोचता हूँ जवाब
तो बनता नहीं
कुछ भी फिर
कहना या
समझना
क्योंकि
ऐसा बहुत कुछ है
जो मुझे जलाता है
जिसे पाने की चाह
मेरे भीतर
बीती कई सदियों से है
मैं
हर बार
एक नयी तमन्ना लिए
नये नये रूपों मे
लेता हूँ
नये नये जन्म
फिर भी
बस इसी तरह
अधूरा रह रह कर
जलता रहता हूँ
और शायद जलता रहूँगा
क्योंकि
अतृप्त
और कुंठित मन के
विरोधाभासी सवालों के जवाब
मेरे पास न हैं
न कभी होंगे।

-यश © 
19/मई/2017

16 May 2017

बुरा तो लगना ही है .....


15 May 2017

कुछ लोग-38

जीवन के
कदम कदम पर
उधार में डूबे हुए
कुछ लोग
क्या क्या
नहीं कर गुजरते
तगादों से
बचने को ।
घूमते हुए
फिरते हुए 
लेकिन
आखिरकार
जब घिरते हैं
चौतरफा
तब समझ आता है
कि
पल पल की
किश्तों से बेहतर
एक मुश्त लेना
और देना ही है।

-यश©

 

13 May 2017

अगर यह कविता है तो .......

यह
जो मैंने लिखा
इस ब्लॉग पर
या डायरी पर
अगर सच में कविता है
तो वह क्या है
जो निराला, महादेवी,प्रसाद
गुप्त और दिनकर
लिख गए
वह क्या है
जो उन जैसे
और भी अनेकों
(जिन्हें मैं जानता
या नहीं जानता )
अपनी कलम से
दिमाग से
कल्पनाशीलता और
शब्द शिल्प से
दर्ज़ कर गए
इतिहास में
स्वर्ण अक्षर ?

इसलिए
मेरी नज़र में
यह जो मैं लिखता हूँ
सिर्फ अतिक्रमण है
अंतर्जाल पर
मिली हुई
मुफ्त की सुविधा का
यह कविता नहीं
सिर्फ कुछ पंक्तियाँ हैं
सब जान कर भी
जिन्हें
लिख देता हूँ
मन के इशारे पर
मन के शब्दों में
क्योंकि
अपने मन की
अंधेरी-उजली दुनिया में
मैं आज़ाद हूँ
अपने मन की
करने को और
कहने को।

-यश©
13/05/2017

12 May 2017

शोषण,शोषक और शोषित



शोषण,शोषक और शोषित
पूरक हैं
आदि काल से
और रहेंगे
अनादि काल तक
जब तक रहेगा
यह जीवन।

हमने
नदियों, तालाबों
पेड़ों और पहाड़ों का  
दोहन किया
शोषण किया
इस्तेमाल किया
और फिर
उत्सर्जित कर दिया।

किसी शोषक ने
हमसे
जी भर काम लिया
दिन भर के पसीने का
बूंद भर दाम दिया
बिना कुछ सुने –कहे
बस अपने मौन और
कुटिल दृष्टि के साथ
उसकी ‘दया’ का हाथ
हमने थामा
और चल दिये
अपने ठौर पर
चरने को
सूखी सी रोटी
और सोने को
फिर नयी सुबह के
इंतज़ार में ।

और जब
पूरा हुआ इंतज़ार
नयी सुबह का
रात के साथ
सारी बात भूल कर
हम फिर से जुट गए
उसी दिनचर्या में
जो हमारे साथ है
न जाने कितने ही
जन्मों से
और  साथ रहेगी
न जाने कितने ही
जन्मों तक।

शोषण,शोषक और शोषित
हम खुद ही हैं
अपनी दशा की दवा
और ईलाज
हम खुद ही हैं
जो नहीं पहचान पाते
दिन के उजाले
और रात के अंधेरे में
खुद के ही अक्स को। 

-यश © 
12/05/2017

11 May 2017

मजदूर हूँ मैं


06 May 2017

बस अब डूबना बाकी है


मंज़िल तो वही है  वहीं है 
पहुँचने की राह बदलनी बाकी है 
देखना है यहाँ सांसें कितनी बचीं 
कुछ और दूर चलना बाकी है । 

अरमान तो यह था कि चलेंगे साथ 
सात समुंदर पार तक 
मझधार पर भंवर में आ फंसा 
बस अब डूबना बाकी है। 

-यश©

04 May 2017

वह सामने होगा या नहीं।

अजीबो गरीब से
खयालातों में डूबा हुआ
नये हालातों में
कहीं खोया हुआ
गिन रहा हूँ दिन
जिंदगी के
कि जो आज है
वह कल होगा या नहीं
कल आज से बेहतर
या बदतर होगा कि नहीं
पर मैं
उलझन में  नहीं
निश्चिंत हूँ
मौन हूँ
सिर्फ यह देखने के लिए
जो मेरे मन में है
वह सामने होगा या नहीं।
.
~यश ©

15 October 2016

कुछ लोग-37

कुछ लोग
कुछ लोगों को समझ कर
खुद से नीचा
और खुद को
ऊंचा मान कर
न जाने किस गुमान में
हरदम खोए रह कर
सोए रहते हैं
गहरी नींद में
जो जब टूटती है
तब एहसास दिलाती है
उस अंतर का
जो होता है
घमंड
और स्वाभिमान में
शैतान
और इंसान में
पर उस अंतर को समझने में
हो जाती है कभी कभी देर
कि बस अपने अंधेरे में
खोए रह जाते हैं
कुछ लोग
हमेशा के लिए।

~यशवन्त यश ©

11 October 2016

समय की धारा


समय की धारा
तेज़ी से चलते चलते
अपने साथ बहा लेती है
बहुत से कल और आज को
भूत और वर्तमान को
सैकड़ों अवरोधो को भेद कर
कितनी ही बातों को
खुद में समेट कर
थोड़ी रेत का ढेर बन कर
कुछ रुकती है
थमती है
और फिर चलती है
समय की धारा
अपनी अबूझ
मंज़िल की ओर।
 
~यशवन्त यश©

12 April 2016

हज़रत गंज

नवाबों के शहर में जहाँ
बिखरे हैं कई रंग
हजरातों की बस्ती
जिसे कहते हैं हज़रत गंज ।

यह मेरे शहर की
धड़कन है
जान है
इसकी हर अदा पे फिदा
हर बूढ़ा और नौजवान है ।

यहाँ मोटरों के रेले हैं
चाटों के ठेले हैं
यहाँ के बरामदों में
सभ्यताओं के मेले हैं ।

बुर्कानशीं हैं यहाँ
तो बेपरवाह मस्तियाँ हैं
कॉफी की चुस्कीयों संग
साहित्य की गोष्ठियाँ हैं ।

पहनावे मिलते हैं यहाँ
दुकानों पे तरह तरह के
दिखावे दिखते हैं यहाँ
इन्सानों में तरह तरह के ।

मैंने देखा है यहाँ
जूठनों को चाटता बचपन
नवाबों का शहर और
हजरातों का हज़रत गंज।

~यशवन्त यश©

01 April 2016

मूर्खता

मूर्खता
हमारे भीतर
कहीं गहरे
रच बस कर
बना लेती है
अपना
मुस्तखिल ठौर
इस जीवन की
सच्चाईयों
बुराइयों
और
अच्छाइयों के साथ।
शुरू से अंत तक
शून्य से शून्य तक
उसी आरंभ पर
आ मिलकर
सब कुछ अपने में
समेटते हुए
मौन की भाषा में
कुछ कहते हुए
मूर्खता
जब निकलती है
बाहर
सनक और गंभीरता के
अबूझ आवरण से
तब
बन जाती है कारण
औरों के हास्य का
लेकिन खुद में
होती है एक विमर्श
क्या-क्यों और कैसे के
पल पल उभरते
असंख्य प्रश्नों का।

  ~यशवन्त यश©
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